फलक से कुछ ऊपर
एक नादान सा तारा
पूरी रात मेरी खिड़की पर
टंगा खेलता रहा
मैं टकटकी लगाए
उसका ध्यान रखता रहा
सिर्फ इक पल को मेरी आँखें
झपकी में बंद हुईं
बस तभी वो चालाक चोर
भरी रात में उसे तोड़ ले गया
कब आती हो कब चली जाती हो
कुछ इल्म ही नहीं होता
तुमसे इतनी बातें करनी हैं
राज़ खोंलने हैं किस्से कहने हैं
पिछली बार जब चाँद की
शमा जलाकर हम तुम बैठे
थे तो दिल की न जाने
कितनी गिरहें खोली
कितने सवाल बीने
बहुत सुकूँ मिला
सुनो .. इस बार
थोडा रुक के जाना