Wednesday, February 20, 2013

India 2.0

जब से तेरी धूल में उतरा हूँ मैं
तेरे साथ तेरी आग में जलता हूँ मैं
किताबें क्यों सभी, बेज़ार लगती हैं
जब से तेरी सलवटों को पढ़ता हूँ मैं

* बेज़ार = boring, useless

--India, March 22, 2012

Leaving Seattle..

छोड़े जाता हूँ ऐ शहर 
जो तुझे इस तरह
क्या ये इजाज़त है कि फिर भी 
तुझे अपना कह सकूं

--Seattle, March 12, 2012

Evening in Seattle..

On rainwashed earth, under fading sky 
the scent of'ur breath rolled deep inside
In t'sensual blue drape that set me dreamin' 
Seattle, you looked gorgeous this evening

--Seattle, June 8, 2011

Tuesday, February 7, 2012

On Snow in Seattle

इस साल बर्फ़
इतनी मायूस क्यों है
ना वो शरारत है
ना वो नादानी
गाड़ी के शीशे से
हटाने को हाथ फेरो
तो तंग भी नहीं करती
अलग हो लेती है
कहीं और जा बैठती है

पिछले बरस ये ऐसी
चुपचाप नहीं थी
हाथ पकड़ कर, ज़िद करके
खुद खेलने ले जाती थी
कभी काँधे पे
चढ़ जाती थी
तो कभी पैर में
लिपट जाती थी
ये बर्फ खिखिलाती थी
जब कमीज़ में छुपकर
ज़ोर से गुदगुदाती थी

पर इस बरस
अकेली सी रहती है
पिछली बार जो सफ़ेद दुपट्टा
हठ करके सिलवाया था
किसी कफ़न की तरेह
ओढ़े बैठी है
पूछो, तो कुछ कहती नहीं
देखो, तो ज़रा हँस देती है
दिल की बीमार लगती है अपनी बरफां
अब शायद छोटी गुड़िया नहीं रही
..बड़ी हो गयी है

Thursday, January 19, 2012

Rubaai

surprisingly, a walkable night in Seattle. and writerly too !
:~
कुछ भोली सहमी रातें
आधी अधूरी मुलाकातें
कल जेब में मिलीं कुछ
पिछले सफ़र की बातें

--Seattle, Jan 8 2012

Thursday, December 15, 2011

on winters in Seattle ...

सर्दियों में ये शहर
एक ही रात पहने
कई दिन गुज़ार देता है
रात भी अब
रंग छोड़ने लगी है
शहर काला पड़ता
जा रहा है
कभी कभार धूप के कुछ
छीटें मार लेता है
तो यह कालिख थोड़ी
धुल जाया करती है
चेहरे पर कुछ चमक
आ जाया करती है

सर्दियों में ये शहर
एक ही रात पहने
कई दिन गुज़ार देता है

Tuesday, December 6, 2011

6th December

Anniversary of Babri Masjid Demolition... An old piece that, I feel, says what I want to say

दिसम्बर की सर्दी थी पर
यहाँ गरम हवाएं चली थीं
राख हो गया था सारा मोहल्ला
वो साथी वो रिश्ते वो नाते
वो हँसते खेलते बचपन
वो बच्चों का स्कूल जाना
वो दादा दादी की कहानियां
वो माँ के हाथ का खाना
वो ईद वो दीवाली
वो मेरे घर को तेरा आना
वो वाह वाह वो तर्रन्नुम
वो बैठक वो महफ़िल ज़माना

दिसम्बर की सर्दी थी पर
यहाँ गरम हवाएं चली थीं
तूफ़ान सा उठता
चला आता था
मुझे तुझमें
और तुझे मुझमें
फर्क नज़र आता था
वो किस बात का
खून खराबा था
आँगन में मिली थीं
जिन बच्चों की लाशें
उनसे तो तुझे भी मोहब्बत थी
और मुझे भी
बस वही हम दोनों को
इंसान बनाता था