Monday, September 5, 2011

मुन्नू के लिए

Dad being in a transferable job, many of my friendships had to part in childhood. As I look back, I feel that those friendships did not die, rather got frozen in time, their innocence preserved and insulated from all the harsh realizations and realities of growing up. Rare would be such objects of sheer simplicity & purity in my otherwise complicated life. One such friendship was with Manish, lovingly called Munnu, whom I could not see or talk to all these years. A few days back, as I turned to his facebook page to wish him happy birthday, I was told that he left us two years ago due to an unfortunate heart attack. A few words poured out that day as I remembered him. I hope he is listening to me wherever he is.

खेल
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याद है वो खेल
पांचवी में थे हम
स्कूल की बन रही बिल्डिंग
के सामने पड़ी
उस बंजर ज़मीन में
बनी तंग खाइयों पर
कूदते हुए जाने
की रेस लगाते थे

दीवाने थे हम उस खेल के,
रिसेस की घंटी बजते ही
कभी कभी तो टिफिन भी आधा छोड़,
दौड़ पड़ते थे - एक दूसरे को आज़माने
मैं लम्बे होने का
फायदi उठा लेता था
तो तुम
अपनी तेज़ रफ़्तार का,
मुकाबला टक्कर का रहता था

ज़िन्दगी के इस खेल में
बची हुई इन खाइयों पर
मुझे अकेला ही कूदते हुए
क्यों छोड़ गए हो मुन्नू
यही एक रेस तो हमें
साथ ख़त्म करनी थी दोस्त,
यही एक रेस

Saturday, August 13, 2011

बेचैनी (Recitation)


Lyrics

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Friday, August 12, 2011

बेचैनी

रात भर घुलता रहा चाँद फ़लक पर
रात भर रोती रही हवा सिसक कर
रात भर तेरी यादों की चादर ओढ़े
बेचैन से बस, करवट बदलते रहे हम

शब्दार्थ :- फ़लक = sky

Saturday, August 6, 2011

बाज़ार

ये कौन सा बाज़ार है
जहां एहसासों को बेचा जाता है,
कारोबार के शोर में
सन्नाटों को फेंका जाता है,
खरीदारों की भीड़ में
तन्हाइयों को पेशा जाता है |
इन्हीं साजों सामानों के बीच
कुछ वो एहसास भी हैं
जिन्हें तुम कभी छोड़
गए थे मेरे पास,
एक अरसे से रखे हुए थे
मेरी मेज़ की ड्रोअर में |
मुफ़लिसी के इन दिनों में
ले आया हूँ अब उन्हें भी
नज्मों बज्मों की
इन दुकानों में,
शायद यहीं कुछ मोल मिल जाए,
इस अजीब से बाज़ार में जहां
..जज़्बातों को बेचा जाता है

शब्दार्थ :- मुफ़लिसी = poverty

Monday, August 1, 2011

हिज्र की रात (Night of Separation)

याद है वो रात ?
जब हिज्र के दर्द में
हम घंटों रोये थे ,
वो सुर्ख सा पेड़ जिसकी
बेजान सी एक डाल तले
मेरी गोद में रखके सर
तुम भी एक बेजान सी
घंटों लेटी रहीं ,
ना मेरे पास
कोई जवाब था
ना तुम्हारे पास
कोई उम्मीद

उस रात के कुछ लम्हे
अब पक़ चुके हैं,
उम्र के साथ कुछ हसीं
भी हो आयें हैं,
और जहां हमने अपने सपनों
को दफ़्न किया था,
जाकर देखो वहाँ एक
फूल खिल आया है


शब्दार्थ :- हिज्र = separation, बेजान = lifeless, दफ़्न = bury

Monday, July 25, 2011

' सॉरी ' (Sorry)

' सॉरी ' ये लफ्ज़ आख़िर क्या है
तुम्हारी ज़बां से निकली
जो ये हवा है
' सॉरी ' तुमने बस कह दिया
और मैंने सुन भी लिया
पर दिल तो अब भी
वहीँ टूटा पड़ा है

काश के ये लफ्ज़ हमने
बनाया ही ना होता
तो तुम सिर्फ दिल
से माफ़ी माँग सकते
और मैं सिर्फ दिल
से माफ़ कर सकता

(*Credits/Notes : Inspired by Zindagi Na Milegi Dobara.)

Sunday, July 17, 2011

इस हफ्ते मकाँ बदलना है

इस हफ्ते मकाँ बदलना है
खुद कहीं लापता हूँ
पर पता बदलना है
इस हफ्ते मकाँ बदलना है

कुछ फ़ुरसत मिली तो आज
अपने कमरे में कुछ देर
तक यूँ ही डोलता रहा |
दो साल पहले जिस ज़िन्दगी
को चंद बक्सों में
उठा कर ले आया था
वो इस कमरे के कौने कौने
में ऐसे फ़ैल चुकी थी
जैसे किसी दीवार से
लिपटी हुई बेल हो जिसकी
ना तो शुरुआत का पता
चलता है ना ही अंत का |
कहीं फर्नीचर, कहीं किताबें
कुछ गैजेट्स, कुछ कपड़े,
कहीं पेड़ पौधे, कहीं साज़
कुछ अधूरी पड़ी नज्में |
कितना कुछ उठाया जायेगा,
पहुँचाया जायेगा
और फिर से सजाया जायेगा
कुछ टूट जायेगा
कुछ यहीं छूट जायेगा
कुछ खो जायेगा
शायद कुछ मिल भी जायेगा

यूँ तो एक आफत एक झंझट ही है ये
मगर दिल को कुछ सुकूँ भी होता है
के इतना भी आवारा नहीं हूँ मैं
मुझसे भी एक घर सा बनता है
मेरे साथ भी ..
.. कुछ सामान चलता है