Sunday, October 23, 2011

रुबाई

दे सोहबत में कुछ तो पल
फ़िर बेवफाई भी सही
तू नहीं तो तेरी दी हुई
तन्हाई ही सही

* सोहबत = company

Monday, October 3, 2011

हाथ

हाथ सीख जाते हैं,
सीख जाते हैं एक नन्ही सी जान
को गोद में उठा लेना
एक बुज़ुर्ग को सहारा देना
अंधे को आँख देना
तबले को ताल देना
रोड़े ईंट पत्थरों को फोड़ना
या नाज़ुक से फूल को तोडना

हाथ समझदार हैं,
समझते हैं क्या ज़ुरूरी है
मन भले चंचल सा भटकता रहे
पर ये स्थिर होकर
काम करना जानते हैं
एक बच्चे की पीठ थपथपाकर
हौंसला बढ़ाना जानते हैं
एक दोस्त के काँधे पर हाथ रखकर
तसल्ली देना जानते हैं

हाथ ज़िद्दी हैं, गुस्सैल हैं,
जो मुठ्ठी भीच लूं
तो कुछ तोड़ के ही दम लेते हैं
किसी नारे के लिए उठ जायें
तो आवाज़ को ललकार बना देते हैं
और जो हज़ारों हाथ साथ दे जाएँ
तो क्रांति ला देते हैं
तख्ता पलट देते हैं
इतिहास बना देते हैं

हाथ रूमानी हैं,
प्यार करना जानते हैं
हाथ में उसका हाथ में आते ही
पिघल से जाते हैं
कोमल हो जाते हैं
परवाह करने लगते हैं
किसी का ख़याल करने लगते हैं
उसकी उँगलियों में इन उँगलियों को
ऐसे फंसा लेते हैं
जैसे इन्हें एक दूसरे के लिए ही
बनाया गया हो

हाथ खूबसूरत हैं,
श्रृंगार करते भी हैं
श्रृंगार बनते भी हैं
और बेहद खूबसूरत
तो वो दो हाथ थे,
वो झुर्रियों से
गढ़े हुए दो हाथ,
वो जर्जर सूख चुके दो हाथ,
जिन्होंने कलकत्ता की सड़को से
एक एक कोढ़ी को उठाकर
नहलाया, इज्ज़त के साफ़ कपडे पहनाये
रहने के लिए छत दी
और जी सकने लिए एक उम्मीद

Friday, September 23, 2011

परछाईं

आज रात फिर आँख खुली
खिड़की पर फिर कोई परछाईं चली
कोई रोज़ ब रोज़
मुझ पर नज़र रख रहा है
खुदा जाने कौन है
क्यों परेशां हो रहा है,
कभी दिख जाये
तो पुकार लूं
तुम यहीं आ जाया करो
यहीं ठहर जाया करो
तुम वहाँ गलियों में
आवारा भटकते रहते हो
मैं यहाँ घर में
तन्हा बैठा रहता हूँ

आज रात फिर आँख खुली
खिड़की पर फिर कोई परछाईं चली

Wednesday, September 14, 2011

ख्याल

ज़िन्दगी यूं भरी भरी सी है
के हाथ फेरने तक की जगह नहीं
अरी मेरी प्यारी नज़्म,
तुम्हारे लिए कोई ख्याल
कहाँ से निकालूँ

Monday, September 5, 2011

मुन्नू के लिए

Dad being in a transferable job, many of my friendships had to part in childhood. As I look back, I feel that those friendships did not die, rather got frozen in time, their innocence preserved and insulated from all the harsh realizations and realities of growing up. Rare would be such objects of sheer simplicity & purity in my otherwise complicated life. One such friendship was with Manish, lovingly called Munnu, whom I could not see or talk to all these years. A few days back, as I turned to his facebook page to wish him happy birthday, I was told that he left us two years ago due to an unfortunate heart attack. A few words poured out that day as I remembered him. I hope he is listening to me wherever he is.

खेल
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याद है वो खेल
पांचवी में थे हम
स्कूल की बन रही बिल्डिंग
के सामने पड़ी
उस बंजर ज़मीन में
बनी तंग खाइयों पर
कूदते हुए जाने
की रेस लगाते थे

दीवाने थे हम उस खेल के,
रिसेस की घंटी बजते ही
कभी कभी तो टिफिन भी आधा छोड़,
दौड़ पड़ते थे - एक दूसरे को आज़माने
मैं लम्बे होने का
फायदi उठा लेता था
तो तुम
अपनी तेज़ रफ़्तार का,
मुकाबला टक्कर का रहता था

ज़िन्दगी के इस खेल में
बची हुई इन खाइयों पर
मुझे अकेला ही कूदते हुए
क्यों छोड़ गए हो मुन्नू
यही एक रेस तो हमें
साथ ख़त्म करनी थी दोस्त,
यही एक रेस

Saturday, August 13, 2011

बेचैनी (Recitation)


Lyrics

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Friday, August 12, 2011

बेचैनी

रात भर घुलता रहा चाँद फ़लक पर
रात भर रोती रही हवा सिसक कर
रात भर तेरी यादों की चादर ओढ़े
बेचैन से बस, करवट बदलते रहे हम

शब्दार्थ :- फ़लक = sky