Thursday, January 19, 2012

Rubaai

surprisingly, a walkable night in Seattle. and writerly too !
:~
कुछ भोली सहमी रातें
आधी अधूरी मुलाकातें
कल जेब में मिलीं कुछ
पिछले सफ़र की बातें

--Seattle, Jan 8 2012

Thursday, December 15, 2011

on winters in Seattle ...

सर्दियों में ये शहर
एक ही रात पहने
कई दिन गुज़ार देता है
रात भी अब
रंग छोड़ने लगी है
शहर काला पड़ता
जा रहा है
कभी कभार धूप के कुछ
छीटें मार लेता है
तो यह कालिख थोड़ी
धुल जाया करती है
चेहरे पर कुछ चमक
आ जाया करती है

सर्दियों में ये शहर
एक ही रात पहने
कई दिन गुज़ार देता है

Tuesday, December 6, 2011

6th December

Anniversary of Babri Masjid Demolition... An old piece that, I feel, says what I want to say

दिसम्बर की सर्दी थी पर
यहाँ गरम हवाएं चली थीं
राख हो गया था सारा मोहल्ला
वो साथी वो रिश्ते वो नाते
वो हँसते खेलते बचपन
वो बच्चों का स्कूल जाना
वो दादा दादी की कहानियां
वो माँ के हाथ का खाना
वो ईद वो दीवाली
वो मेरे घर को तेरा आना
वो वाह वाह वो तर्रन्नुम
वो बैठक वो महफ़िल ज़माना

दिसम्बर की सर्दी थी पर
यहाँ गरम हवाएं चली थीं
तूफ़ान सा उठता
चला आता था
मुझे तुझमें
और तुझे मुझमें
फर्क नज़र आता था
वो किस बात का
खून खराबा था
आँगन में मिली थीं
जिन बच्चों की लाशें
उनसे तो तुझे भी मोहब्बत थी
और मुझे भी
बस वही हम दोनों को
इंसान बनाता था

Friday, November 25, 2011

ख्वाब और हकीक़त

गुज़रे हुए वक़्त के
एक दर्द भरे लम्हे ने
कल के किसी हसीं ख्वाब से
झल्लाकर कहा
कम से कम मैं
हुआ तो था,
तुम तो शायद कोख़ से
बाहर ही नहीं आओगे,
हँसता हुआ ख्वाब
धीरे से बोला
अरे पागल ! किसने कहा
कि मैं नहीं होता
हकीक़त बनूँ ना बनूँ
पर मैं होता ज़रूर हूँ
मुझसे ही आदमी है,
कैफ़ियत है, ज़िन्दगी है
मुझसे ही तुम भी हो
मेरे जैसे ही किसी
ख्वाब में तुम हुए
ये सब हर तरफ देखो
सब एक ख्वाब ही तो है
बस अभी टूटा नहीं है

Saturday, November 12, 2011

रुबाई

नमक है हिज्र से
इश्क में प्यार में
मज़ा ही क्या है 'अमन'
वस्ल-ए-यार में

*Meanings : हिज्र=separation, वस्ल=togetherness

Sunday, October 23, 2011

रुबाई

दे सोहबत में कुछ तो पल
फ़िर बेवफाई भी सही
तू नहीं तो तेरी दी हुई
तन्हाई ही सही

* सोहबत = company

Monday, October 3, 2011

हाथ

हाथ सीख जाते हैं,
सीख जाते हैं एक नन्ही सी जान
को गोद में उठा लेना
एक बुज़ुर्ग को सहारा देना
अंधे को आँख देना
तबले को ताल देना
रोड़े ईंट पत्थरों को फोड़ना
या नाज़ुक से फूल को तोडना

हाथ समझदार हैं,
समझते हैं क्या ज़ुरूरी है
मन भले चंचल सा भटकता रहे
पर ये स्थिर होकर
काम करना जानते हैं
एक बच्चे की पीठ थपथपाकर
हौंसला बढ़ाना जानते हैं
एक दोस्त के काँधे पर हाथ रखकर
तसल्ली देना जानते हैं

हाथ ज़िद्दी हैं, गुस्सैल हैं,
जो मुठ्ठी भीच लूं
तो कुछ तोड़ के ही दम लेते हैं
किसी नारे के लिए उठ जायें
तो आवाज़ को ललकार बना देते हैं
और जो हज़ारों हाथ साथ दे जाएँ
तो क्रांति ला देते हैं
तख्ता पलट देते हैं
इतिहास बना देते हैं

हाथ रूमानी हैं,
प्यार करना जानते हैं
हाथ में उसका हाथ में आते ही
पिघल से जाते हैं
कोमल हो जाते हैं
परवाह करने लगते हैं
किसी का ख़याल करने लगते हैं
उसकी उँगलियों में इन उँगलियों को
ऐसे फंसा लेते हैं
जैसे इन्हें एक दूसरे के लिए ही
बनाया गया हो

हाथ खूबसूरत हैं,
श्रृंगार करते भी हैं
श्रृंगार बनते भी हैं
और बेहद खूबसूरत
तो वो दो हाथ थे,
वो झुर्रियों से
गढ़े हुए दो हाथ,
वो जर्जर सूख चुके दो हाथ,
जिन्होंने कलकत्ता की सड़को से
एक एक कोढ़ी को उठाकर
नहलाया, इज्ज़त के साफ़ कपडे पहनाये
रहने के लिए छत दी
और जी सकने लिए एक उम्मीद